Anantnath Chalisa अनन्तनाथ चालीसा – 14वें तीर्थंकर की आराधना

Anantnath Chalisaजैन धर्म के 14वें तीर्थंकर श्री अनन्तनाथ जी की आराधना के लिए अनन्तनाथ चालीसा का भक्तिपूर्वक पाठ करें.

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इस पोस्ट में हमने श्री अनन्तनाथ चालीसा | Shri Anantnath Chalisa का प्रकाशन किया है. साथ ही पोस्ट के अंत में हम श्री अनन्त जी के बारे में भी कुछ जानकारी प्राप्त करेंगे.

भक्तिपूर्वक बोलिए जय श्री अनन्तनाथ महाराज.

Anantnath Chalisa अनन्तनाथ चालीसा

|| श्री अनन्तनाथ चालीसा ||

अनन्त चतुष्टय धारी ‘अनन्त, अनन्त गुणों की खान “अनन्त’ ।

सर्वशुध्द ज्ञायक हैं अनन्त, हरण करें मम दोष अनन्त ।

नगर अयोध्या महा सुखकार, राज्य करें सिहंसेन अपार ।

सर्वयशा महादेवी उनकी, जननी कहलाई जिनवर की ।

द्वादशी ज्येष्ठ कृष्ण सुखकारी, जन्मे तीर्थंकर हितकारी ।

इन्द्र प्रभु को गोद में लेकर, न्हवन करें मेरु पर जाकर ।

नाम “अनन्तनाथ’ शुभ बीना, उत्सव करते नित्य नवीना ।

सार्थक हुआ नाम प्रभुवर का, पार नहीं गुण के सागर का ।

वर्ण सुवर्ण समान प्रभु का, जान धरें मति- श्रुत- अवधि का ।

आयु तीस लख वर्ष उपाई, धनुष अर्घशन तन ऊंचाई ।

बचपन गया जवानी आई, राज्य मिला उनको सुखदाई ।

हुआ विवाह उनका मंगलमय, जीवन था जिनवर का सुखमय ।

पन्द्रह लाख बरस बीते जब, उल्कापात से हुए विरत तब ।

जग में सुख पाया किसने-कब, मन से त्याग राग भाव सब ।

बारह भावना मन में भाये, ब्रह्मर्षि वैराग्य बढाये ।

“अनन्तविजय” सुत तिलक-कराकर, देवोमई शिविका पधरा कर ।

गए सहेतुक वन जिनराज, दीक्षित हुए सहस नृप साथ ।

द्वादशी कृष्ण ज्येष्ठ शुभ मासा, तीन दिन का धारा उपवास ।

गए अयोध्या प्रथम योग कर, धन्य ‘विशाख’ आहार करा कर ।

मौन सहित रहते थे वन में, एक दिन तिष्ठे पीपल- तल में ।

अटल रहे निज योग ध्यान मेँ, झलके लोकालोक ज्ञान मेँ ।

कृष्ण अमावस चैत्र मास की, रचना हुई शुभ समवशरण की ।

जिनवर की वाणी जब खिरती, अमृत सम कानों को लगती ।

चतुर्गति दुख चित्रण करते, भविजन सुन पापों से डरते ।

जो चाहो तुम मुयित्त पाना, निज आतम की शरण में जाना ।

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सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चरित हैँ, कहे व्यवहार मेँ रतनत्रय हैं ।

निश्चय से शुद्धातम ध्याकर, शिवपट मिलना सुख रत्नाकर ।

श्रद्धा करके भव्य जनों ने, यथाशक्ति व्रत धारे सबने ।

हुआ विहार देश और प्रान्त, सत्पथ दर्शाये जिननाथ ।

अन्त समय गए सम्मेदाचल, एक मास तक रहे सुनिश्चल ।

कृष्ण चैत्र अमावस पावन, भोक्षमहल पहुंचे मनभावन ।

उत्सव करते सुरगण आकर, कूट स्वयंप्रभ मन में ध्याकर ।

शुभ लक्षण प्रभुवर का ‘सेही’, शोभित होता प्रभु- पद में ही ।

हम सब अरज करे बस ये ही, पार करो भवसागर से ही ।

है प्रभु लोकालोक अनन्त, झलकें सब तुम ज्ञान अनन्त ।

हुआ अनन्त भवों का अन्त, अद्भुत तुम महिमां है “अनन्त’ ।

श्री अनन्तनाथ चालीसा | Shri Anantnath Chalisa के पाठ के पश्चात Anantanatha Aarti – भगवान अनंतनाथ की आरती भी करें.

Video

Shri Anantnath Chalisa | श्री अनन्तनाथ चालीसा विडियो निचे दिया हुआ है. आप इस विडियो को प्ले बटन दबाकर देख सकतें हैं.

Shri Anantnath Chalisa

श्री अनन्तनाथ चालीसा (Shri Anantnath Chalisa) का महत्व

  • श्री अनन्तनाथ चालीसा (Shri Anantnath Chalisa) जैन धर्म के 14वें तीर्थंकर श्री अनन्तनाथ जी की आराधना का एक सरल माध्यम है.
  • अनन्तनाथ चालीसा के पाठ के द्वारा भगवान श्री अनन्तनाथ जी की आराधना और स्तुति की जाती है.
  • भगवान श्री अनन्तनाथ जी की आराधना के लिए सम्पूर्ण मनोयोग के साथ चालीसा के पाठ से मनुष्य को आत्मिक शांति की प्राप्ति होती है.
  • दुःख और दर्द भगवान श्री अनन्तनाथ जी की आराधना से दूर हो जातें हैं.

भगवान श्री अनन्तनाथ जी से संबंद्धित कुछ बातें

श्री अनन्तनाथ भगवान जैन धर्म के 14 वें तीर्थंकर हैं. इनका जन्म अयोध्या में इक्ष्वाकु वंश में हुआ था. इनके पिता का नाम सिंहसेन और माता का नाम सुयशा था.

तीर्थंकर14 वें
पितासिंहसेन
मातासुयशा
वंशइक्ष्वाकु
जन्म स्थानअयोध्या
मोक्ष स्थानसम्मेद शिखर

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