Bhaktamar Stotra – श्री भक्तामर स्तोत्र

Bhaktamar Stotra – श्री भक्तामर स्तोत्र – श्री भक्तामर स्तोत्र एक अत्यंत ही दिव्य और शक्तिशाली स्तोत्र है.

इस स्तोत्र का नियमित पाठ बहुत से सकारात्मक परिणाम दिलाता है. सम्पूर्ण भक्ति भावना के साथ ही श्री भक्तामर स्तोत्र का पाठ करें.

आचार्य मानतुंग के द्वारा रचित इस स्तोत्र में साक्षात् भगवान की अनुभूति करवाने की क्षमता है.

आज के इस पोस्ट में हम श्री भक्तामर स्तोत्र को संस्कृत और हिंदी में (Bhaktamar Stotra in Sanskrit and Hindi) प्रकाशित कर रहें हैं.

साथ ही हम श्री भक्तामर स्तोत्र का हिंदी अर्थ (Bhaktamar Stotra Hindi Meaning) भी प्रकाशित कर रहें हैं.

इसके साथ हम श्री भक्तामर स्तोत्र का लिरिक्स (Bhaktamar Stotra Lyrics) भी प्रकाशित कर रहें हैं.

आप सबके लिए इस पोस्ट में श्री भक्तामर स्तोत्र की विडियो और ऑडियो भी दी गयी है.

Shri Bhaktamar Stotra | श्री भक्तामर स्तोत्र

stotra

|| श्री भक्तामर स्तोत्र ||

भक्तामर – प्रणत – मौलि – मणि -प्रभाणा-
मुद्योतकं दलित – पाप – तमो – वितानम्।

सम्यक् -प्रणम्य जिन – पाद – युगं युगादा-
वालम्बनं भव – जले पततां जनानाम्।। 1॥

य: संस्तुत: सकल – वाङ् मय – तत्त्व-बोधा-
दुद्भूत-बुद्धि – पटुभि: सुर – लोक – नाथै:।

स्तोत्रैर्जगत्- त्रितय – चित्त – हरैरुदारै:,
स्तोष्ये किलाहमपि तं प्रथमं जिनेन्द्रम्॥ 2॥

बुद्ध्या विनापि विबुधार्चित – पाद – पीठ!
स्तोतुं समुद्यत – मतिर्विगत – त्रपोऽहम्।

बालं विहाय जल-संस्थित-मिन्दु-बिम्ब-
मन्य: क इच्छति जन: सहसा ग्रहीतुम् ॥ 3॥

वक्तुं गुणान्गुण -समुद्र ! शशाङ्क-कान्तान्,
कस्ते क्षम: सुर – गुरु-प्रतिमोऽपि बुद्ध्या ।

कल्पान्त -काल – पवनोद्धत- नक्र- चक्रं ,
को वा तरीतुमलमम्बुनिधिं भुजाभ्याम्॥ 4॥

सोऽहं तथापि तव भक्ति – वशान्मुनीश!
कर्तुं स्तवं विगत – शक्ति – रपि प्रवृत्त:।

प्रीत्यात्म – वीर्य – मविचार्य मृगी मृगेन्द्रम्
नाभ्येति किं निज-शिशो: परिपालनार्थम्॥ 5॥

अल्प- श्रुतं श्रुतवतां परिहास-धाम,
त्वद्-भक्तिरेव मुखरी-कुरुते बलान्माम् ।

यत्कोकिल: किल मधौ मधुरं विरौति,
तच्चाम्र -चारु -कलिका-निकरैक -हेतु:॥ 6॥

त्वत्संस्तवेन भव – सन्तति-सन्निबद्धं,
पापं क्षणात्क्षयमुपैति शरीरभाजाम् ।

आक्रान्त – लोक – मलि -नील-मशेष-माशु,
सूर्यांशु- भिन्न-मिव शार्वर-मन्धकारम्॥ 7॥

मत्वेति नाथ! तव संस्तवनं मयेद, –
मारभ्यते तनु- धियापि तव प्रभावात् ।

चेतो हरिष्यति सतां नलिनी-दलेषु,
मुक्ता-फल – द्युति-मुपैति ननूद-बिन्दु:॥ 8॥

आस्तां तव स्तवन- मस्त-समस्त-दोषं,
त्वत्सङ्कथाऽपि जगतां दुरितानि हन्ति ।

दूरे सहस्रकिरण: कुरुते प्रभैव,
पद्माकरेषु जलजानि विकासभाञ्जि ॥ 9॥

नात्यद्-भुतं भुवन – भूषण ! भूत-नाथ!
भूतैर्गुणैर्भुवि भवन्त – मभिष्टुवन्त:।

तुल्या भवन्ति भवतो ननु तेन किं वा
भूत्याश्रितं य इह नात्मसमं करोति ॥ 10॥

दृष्ट्वा भवन्त मनिमेष – विलोकनीयं,
नान्यत्र – तोष- मुपयाति जनस्य चक्षु:।

पीत्वा पय: शशिकर – द्युति – दुग्ध-सिन्धो:,
क्षारं जलं जलनिधेरसितुं क इच्छेत्?॥ 11॥

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यै: शान्त-राग-रुचिभि: परमाणुभिस्-त्वं,
निर्मापितस्- त्रि-भुवनैक – ललाम-भूत !

तावन्त एव खलु तेऽप्यणव: पृथिव्यां,
यत्ते समान- मपरं न हि रूप-मस्ति॥ 12॥

वक्त्रं क्व ते सुर-नरोरग-नेत्र-हारि,
नि:शेष- निर्जित – जगत्त्रितयोपमानम् ।

बिम्बं कलङ्क – मलिनं क्व निशाकरस्य,
यद्वासरे भवति पाण्डुपलाश-कल्पम्॥13॥

सम्पूर्ण- मण्डल-शशाङ्क – कला-कलाप-
शुभ्रा गुणास् – त्रि-भुवनं तव लङ्घयन्ति।

ये संश्रितास् – त्रि-जगदीश्वरनाथ-मेकं,
कस्तान् निवारयति सञ्चरतो यथेष्टम्॥ 14॥

चित्रं – किमत्र यदि ते त्रिदशाङ्ग-नाभिर्-
नीतं मनागपि मनो न विकार – मार्गम्।

कल्पान्त – काल – मरुता चलिताचलेन,
किं मन्दराद्रिशिखरं चलितं कदाचित्॥ 15॥

निर्धूम – वर्ति – रपवर्जित – तैल-पूर:,
कृत्स्नं जगत्त्रय – मिदं प्रकटीकरोषि।

गम्यो न जातु मरुतां चलिताचलानां,
दीपोऽपरस्त्वमसि नाथ ! जगत्प्रकाश:॥ 16॥

नास्तं कदाचिदुपयासि न राहुगम्य:,
स्पष्टीकरोषि सहसा युगपज्- जगन्ति।

नाम्भोधरोदर – निरुद्ध – महा- प्रभाव:,
सूर्यातिशायि-महिमासि मुनीन्द्र! लोके॥ 17॥

नित्योदयं दलित – मोह – महान्धकारं,
गम्यं न राहु – वदनस्य न वारिदानाम्।

विभ्राजते तव मुखाब्ज – मनल्पकान्ति,
विद्योतयज्-जगदपूर्व-शशाङ्क-बिम्बम्॥ 18॥

किं शर्वरीषु शशिनाह्नि विवस्वता वा,
युष्मन्मुखेन्दु- दलितेषु तम:सु नाथ!

निष्पन्न-शालि-वन-शालिनी जीव-लोके,
कार्यं कियज्जल-धरै-र्जल-भार-नमै्र:॥ 19॥

ज्ञानं यथा त्वयि विभाति कृतावकाशं,
नैवं तथा हरि -हरादिषु नायकेषु।

तेजः स्फ़ुरन्मणिषु याति यथा महत्त्वं,
नैवं तु काच -शकले किरणाकुलेऽपि॥ 20॥

मन्ये वरं हरि- हरादय एव दृष्टा,
दृष्टेषु येषु हृदयं त्वयि तोषमेति।

किं वीक्षितेन भवता भुवि येन नान्य:,
कश्चिन्मनो हरति नाथ ! भवान्तरेऽपि॥ 21॥

स्त्रीणां शतानि शतशो जनयन्ति पुत्रान्,
नान्या सुतं त्वदुपमं जननी प्रसूता।

सर्वा दिशो दधति भानि सहस्र-रश्मिं,
प्राच्येव दिग्जनयति स्फुरदंशु-जालम् ॥ 22॥

त्वामामनन्ति मुनय: परमं पुमांस-
मादित्य-वर्ण-ममलं तमस: पुरस्तात्।

त्वामेव सम्य – गुपलभ्य जयन्ति मृत्युं,
नान्य: शिव: शिवपदस्य मुनीन्द्र! पन्था:॥ 23॥

त्वा-मव्ययं विभु-मचिन्त्य-मसंख्य-माद्यं,
ब्रह्माणमीश्वर – मनन्त – मनङ्ग – केतुम्।

योगीश्वरं विदित – योग-मनेक-मेकं,
ज्ञान-स्वरूप-ममलं प्रवदन्ति सन्त: ॥ 24॥

बुद्धस्त्वमेव विबुधार्चित-बुद्धि-बोधात्,
त्वं शङ्करोऽसि भुवन-त्रय- शङ्करत्वात् ।

धातासि धीर! शिव-मार्ग विधेर्विधानाद्,
व्यक्तं त्वमेव भगवन् पुरुषोत्तमोऽसि॥ 25॥

तुभ्यं नमस् – त्रिभुवनार्ति – हराय नाथ!
तुभ्यं नम: क्षिति-तलामल -भूषणाय।

तुभ्यं नमस् – त्रिजगत: परमेश्वराय,
तुभ्यं नमो जिन! भवोदधि-शोषणाय॥ 26॥

को विस्मयोऽत्र यदि नाम गुणै-रशेषैस्-
त्वं संश्रितो निरवकाशतया मुनीश !

दोषै – रुपात्त – विविधाश्रय-जात-गर्वै:,
स्वप्नान्तरेऽपि न कदाचिदपीक्षितोऽसि॥ 27॥

उच्चै – रशोक- तरु – संश्रितमुन्मयूख –
माभाति रूपममलं भवतो नितान्तम्।

स्पष्टोल्लसत्-किरण-मस्त-तमो-वितानं,
बिम्बं रवेरिव पयोधर-पाश्र्ववर्ति॥ 28॥

सिंहासने मणि-मयूख-शिखा-विचित्रे,
विभ्राजते तव वपु: कनकावदातम्।

बिम्बं वियद्-विलस – दंशुलता-वितानं
तुङ्गोदयाद्रि-शिरसीव सहस्र-रश्मे: ॥ 29॥

कुन्दावदात – चल – चामर-चारु-शोभं,
विभ्राजते तव वपु: कलधौत -कान्तम्।

उद्यच्छशाङ्क- शुचिनिर्झर – वारि -धार-
मुच्चैस्तटं सुरगिरेरिव शातकौम्भम् ॥ 30॥

छत्र-त्रयं तव विभाति शशाङ्क- कान्त-
मुच्चै: स्थितं स्थगित-भानु-कर-प्रतापम्।

मुक्ता – फल – प्रकर – जाल-विवृद्ध-शोभं,
प्रख्यापयत्-त्रिजगत: परमेश्वरत्वम्॥ 31॥

गम्भीर – तार – रव-पूरित-दिग्विभागस्-
त्रैलोक्य – लोक -शुभ – सङ्गम -भूति-दक्ष:।

सद्धर्म -राज – जय – घोषण – घोषक: सन्,
खे दुन्दुभि-र्ध्वनति ते यशस: प्रवादी॥ 32॥

मन्दार – सुन्दर – नमेरु – सुपारिजात-
सन्तानकादि – कुसुमोत्कर – वृष्टि-रुद्धा।

गन्धोद – बिन्दु- शुभ – मन्द – मरुत्प्रपाता,
दिव्या दिव: पतति ते वचसां ततिर्वा॥ 33॥

शुम्भत्-प्रभा- वलय-भूरि-विभा-विभोस्ते,
लोक – त्रये – द्युतिमतां द्युति-माक्षिपन्ती।

प्रोद्यद्- दिवाकर-निरन्तर – भूरि -संख्या,
दीप्त्या जयत्यपि निशामपि सोमसौम्याम्॥34॥

स्वर्गापवर्ग – गम – मार्ग – विमार्गणेष्ट:,
सद्धर्म- तत्त्व – कथनैक – पटुस्-त्रिलोक्या:।

दिव्य-ध्वनि-र्भवति ते विशदार्थ-सर्व-
भाषास्वभाव-परिणाम-गुणै: प्रयोज्य:॥ 35॥

उन्निद्र – हेम – नव – पङ्कज – पुञ्ज-कान्ती,
पर्युल्-लसन्-नख-मयूख-शिखाभिरामौ।

पादौ पदानि तव यत्र जिनेन्द्र ! धत्त:,
पद्मानि तत्र विबुधा: परिकल्पयन्ति॥ 36॥

इत्थं यथा तव विभूति- रभूज् – जिनेन्द्र !
धर्मोपदेशन – विधौ न तथा परस्य।

यादृक् – प्रभा दिनकृत: प्रहतान्धकारा,
तादृक्-कुतो ग्रहगणस्य विकासिनोऽपि॥ 37॥

श्च्यो-तन्-मदाविल-विलोल-कपोल-मूल,
मत्त- भ्रमद्- भ्रमर – नाद – विवृद्ध-कोपम्।

ऐरावताभमिभ – मुद्धत – मापतन्तं
दृष्ट्वा भयं भवति नो भवदाश्रितानाम्॥ 38॥

भिन्नेभ – कुम्भ- गल – दुज्ज्वल-शोणिताक्त,
मुक्ता – फल- प्रकरभूषित – भूमि – भाग:।

बद्ध – क्रम: क्रम-गतं हरिणाधिपोऽपि,
नाक्रामति क्रम-युगाचल-संश्रितं ते॥ 39॥

कल्पान्त – काल – पवनोद्धत – वह्नि -कल्पं,
दावानलं ज्वलित-मुज्ज्वल – मुत्स्फुलिङ्गम्।

विश्वं जिघत्सुमिव सम्मुख – मापतन्तं,
त्वन्नाम-कीर्तन-जलं शमयत्यशेषम्॥ 40॥

रक्तेक्षणं समद – कोकिल – कण्ठ-नीलम्,
क्रोधोद्धतं फणिन – मुत्फण – मापतन्तम्।

आक्रामति क्रम – युगेण निरस्त – शङ्कस्-
त्वन्नाम- नागदमनी हृदि यस्य पुंस:॥ 41॥

वल्गत् – तुरङ्ग – गज – गर्जित – भीमनाद-
माजौ बलं बलवता – मपि – भूपतीनाम्।

उद्यद् – दिवाकर – मयूख – शिखापविद्धं
त्वत्कीर्तनात्तम इवाशु भिदामुपैति॥ 42॥

कुन्ताग्र-भिन्न – गज – शोणित – वारिवाह,
वेगावतार – तरणातुर – योध – भीमे।

युद्धे जयं विजित – दुर्जय – जेय – पक्षास्-
त्वत्पाद-पङ्कज-वनाश्रयिणो लभन्ते॥ 43॥

अम्भोनिधौ क्षुभित – भीषण – नक्र – चक्र-
पाठीन – पीठ-भय-दोल्वण – वाडवाग्नौ।

रङ्गत्तरङ्ग -शिखर- स्थित- यान – पात्रास्-
त्रासं विहाय भवत: स्मरणाद्-व्रजन्ति ॥ 44॥

उद्भूत – भीषण – जलोदर – भार- भुग्ना:,
शोच्यां दशा-मुपगताश्-च्युत-जीविताशा:।

त्वत्पाद-पङ्कज-रजो – मृत – दिग्ध – देहा,
मर्त्या भवन्ति मकर-ध्वज-तुल्यरूपा:॥ 45॥

आपाद – कण्ठमुरु – शृङ्खल – वेष्टिताङ्गा,
गाढं-बृहन्-निगड-कोटि निघृष्ट – जङ्घा:।

त्वन्-नाम-मन्त्र- मनिशं मनुजा: स्मरन्त:,
सद्य: स्वयं विगत-बन्ध-भया भवन्ति॥ 46॥

मत्त-द्विपेन्द्र- मृग- राज – दवानलाहि-
संग्राम-वारिधि-महोदर – बन्ध -नोत्थम्।

तस्याशु नाश – मुपयाति भयं भियेव,
यस्तावकं स्तव-मिमं मतिमानधीते॥ 47॥

स्तोत्र – स्रजं तव जिनेन्द्र गुणैर्निबद्धाम्,
भक्त्या मया रुचिर-वर्ण-विचित्र-पुष्पाम्।

धत्ते जनो य इह कण्ठ-गता-मजस्रं,
तं मानतुङ्ग-मवशा-समुपैति लक्ष्मी:॥ 48॥

विडियो

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भक्तामर स्तोत्र

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Bhaktamar Stotra

Bhaktamar Stotra in Hindi | भक्तामर स्तोत्र हिंदी में

|| भक्तामर स्तोत्र ||

आदिपुरुष आदीश जिन, आदि सुविधि करतार।
धरम-धुरंधर परमगुरु, नमों आदि अवतार॥

सुर-नत-मुकुट रतन-छवि करैं,
अंतर पाप-तिमिर सब हरैं।

जिनपद बंदों मन वच काय,
भव-जल-पतित उधरन-सहाय॥1॥

श्रुत-पारग इंद्रादिक देव,
जाकी थुति कीनी कर सेव।

शब्द मनोहर अरथ विशाल,
तिस प्रभु की वरनों गुन-माल॥2॥

विबुध-वंद्य-पद मैं मति-हीन,
हो निलज्ज थुति-मनसा कीन।

जल-प्रतिबिंब बुद्ध को गहै,
शशि-मंडल बालक ही चहै॥3॥

गुन-समुद्र तुम गुन अविकार,
कहत न सुर-गुरु पावै पार।

प्रलय-पवन-उद्धत जल-जन्तु,
जलधि तिरै को भुज बलवन्तु॥4॥

सो मैं शक्ति-हीन थुति करूँ,
भक्ति-भाव-वश कछु नहिं डरूँ।

ज्यों मृगि निज-सुत पालन हेतु,
मृगपति सन्मुख जाय अचेत॥5॥

मैं शठ सुधी हँसन को धाम,
मुझ तव भक्ति बुलावै राम।

ज्यों पिक अंब-कली परभाव,
मधु-ऋतु मधुर करै आराव॥6॥

तुम जस जंपत जन छिनमाहिं,
जनम-जनम के पाप नशाहिं।

ज्यों रवि उगै फटै तत्काल,
अलिवत नील निशा-तम-जाल॥7॥

तव प्रभावतैं कहूँ विचार,
होसी यह थुति जन-मन-हार।

ज्यों जल-कमल पत्रपै परै,
मुक्ताफल की द्युति विस्तरै॥8॥

तुम गुन-महिमा हत-दुख-दोष,
सो तो दूर रहो सुख-पोष।

पाप-विनाशक है तुम नाम,
कमल-विकाशी ज्यों रवि-धाम॥9॥

नहिं अचंभ जो होहिं तुरंत,
तुमसे तुम गुण वरणत संत।

जो अधीन को आप समान,
करै न सो निंदित धनवान॥10॥

इकटक जन तुमको अविलोय,
अवर-विषैं रति करै न सोय।

को करि क्षीर-जलधि जल पान,
क्षार नीर पीवै मतिमान॥11॥

प्रभु तुम वीतराग गुण-लीन,
जिन परमाणु देह तुम कीन।

हैं तितने ही ते परमाणु,
यातैं तुम सम रूप न आनु॥12॥

कहँ तुम मुख अनुपम अविकार,
सुर-नर-नाग-नयन-मनहार।

कहाँ चंद्र-मंडल-सकलंक,
दिन में ढाक-पत्र सम रंक॥13॥

पूरन चंद्र-ज्योति छबिवंत,
तुम गुन तीन जगत लंघंत।

एक नाथ त्रिभुवन आधार,
तिन विचरत को करै निवार॥14॥

जो सुर-तिय विभ्रम आरंभ,
मन न डिग्यो तुम तौ न अचंभ।

अचल चलावै प्रलय समीर,
मेरु-शिखर डगमगै न धीर॥15॥

धूमरहित बाती गत नेह,
परकाशै त्रिभुवन-घर एह।

बात-गम्य नाहीं परचण्ड,
अपर दीप तुम बलो अखंड॥16॥

छिपहु न लुपहु राहु की छांहि,
जग परकाशक हो छिनमांहि।

घन अनवर्त दाह विनिवार,
रवितैं अधिक धरो गुणसार॥17॥

सदा उदित विदलित मनमोह,
विघटित मेघ राहु अविरोह।

तुम मुख-कमल अपूरव चंद,
जगत-विकाशी जोति अमंद॥18॥

निश-दिन शशि रवि को नहिं काम,
तुम मुख-चंद हरै तम-धाम।

जो स्वभावतैं उपजै नाज,
सजल मेघ तैं कौनहु काज॥19॥

जो सुबोध सोहै तुम माहिं,
हरि हर आदिक में सो नाहिं।

जो द्युति महा-रतन में होय,
काच-खंड पावै नहिं सोय॥20॥

॥ नाराच ॥

सराग देव देख मैं भला विशेष मानिया ।
स्वरूप जाहि देख वीतराग तू पिछानिया ॥

कछू न तोहि देखके जहाँ तुही विशेखिया ।
मनोग चित्त-चोर ओर भूल हू न पेखिया ॥21॥

अनेक पुत्रवंतिनी नितंबिनी सपूत हैं ।
न तो समान पुत्र और मात तें प्रसूत हैं ॥

दिशा धरंत तारिका अनेक कोटि को गिने ।
दिनेश तेजवंत एक पूर्व ही दिशा जने ॥22॥

पुरान हो पुमान हो पुनीत पुण्यवान हो ।
कहें मुनीश! अंधकार-नाश को सुभानु हो ॥

महंत तोहि जान के न होय वश्य काल के ।
न और मोहि मोक्ष पंथ देय तोहि टाल के ॥23॥

अनंत नित्य चित्त की अगम्य रम्य आदि हो ।
असंख्य सर्वव्यापि विष्णु ब्रह्म हो अनादि हो ॥

महेश कामकेतु योग ईश योग ज्ञान हो ।
अनेक एक ज्ञानरूप शुद्ध संतमान हो ॥24॥

तुही जिनेश! बुद्ध है सुबुद्धि के प्रमान तें ।
तुही जिनेश! शंकरो जगत्त्रयी विधान तें ॥

तुही विधात है सही सुमोख-पंथ धार तें ।
नरोत्तमो तुही प्रसिद्ध अर्थ के विचार तें ॥25॥

नमो करूँ जिनेश! तोहि आपदा निवार हो ।
नमो करूँ सु भूरि भूमि-लोक के सिंगार हो ॥

नमो करूँ भवाब्धि-नीर-राशि-शोष-हेतु हो ।
नमो करूँ महेश! तोहि मोख-पंथ देतु हो ॥26॥

॥ चौपाई ॥

तुम जिन पूरन गुन-गन भरे,
दोष गर्व करि तुम परिहरे ।

और देव-गण आश्रय पाय
स्वप्न न देखे तुम फिर आय ॥27॥

तरु अशोक-तल किरन उदार,
तुम तन शोभित है अविकार ।

मेघ निकट ज्यों तेज फुरंत,
दिनकर दिपे तिमिर निहनंत ॥28॥

सिंहासन मणि-किरण-विचित्र,
ता पर कंचन-वरन पवित्र ।

तुम तन शोभित किरन विथार,
ज्यों उदयाचल रवि तम-हार ॥29॥

कुंद-पुहुप-सित-चमर ढ़ुरंत,
कनक-वरन तुम तन शोभंत ।

ज्यों सुमेरु-तट निर्मल कांति,
झरना झरे नीर उमगांति ॥30॥

ऊँचे रहें सूर-दुति लोप,
तीन छत्र तुम दिपें अगोप ।

तीन लोक की प्रभुता कहें,
मोती झालरसों छवि लहें ॥31॥

दुंदुभि-शब्द गहर गंभीर,
चहुँ दिशि होय तुम्हारे धीर ।

त्रिभुवन-जन शिव-संगम करें,
मानो जय-जय रव उच्चरें ॥32॥

मंद पवन गंधोदक इष्ट,
विविध कल्पतरु पुहुप सुवृष्ट ।

देव करें विकसित दल सार,
मानो द्विज-पंकति अवतार ॥33॥

तुम तन-भामंडल जिन-चंद,
सब दुतिवंत करत हैं मंद ।

कोटि संख्य रवि-तेज छिपाय,
शशि निर्मल निशि करे अछाय ॥34॥

स्वर्ग-मोख-मारग संकेत,
परम-धरम उपदेशन हेत ।

दिव्य वचन तुम खिरें अगाध,
सब भाषा-गर्भित हित-साध ॥35॥

॥ दोहा ॥

विकसित-सुवरन-कमल-दुति,
नख-दुति मिलि चमकाहिं ।

तुम पद पदवी जहँ धरो,
तहँ सुर कमल रचाहिं ॥36॥

ऐसी महिमा तुम-विषै,
और धरे नहिं कोय ।

सूरज में जो जोत है,
नहिं तारा-गण होय ॥37॥

॥ षट्पद ॥

मद-अवलिप्त-कपोल-मूल अलि-कुल झँकारें ।
तिन सुन शब्द प्रचंड क्रोध उद्धत अति धारें ॥

काल-वरन विकराल कालवत् सनमुख आवे ।
ऐरावत सो प्रबल सकल जन भय उपजावे ॥

देखि गयंद न भय करे, तुम पद-महिमा लीन ।
विपति-रहित संपति-सहित, वरतैं भक्त अदीन ॥38॥

अति मद-मत्त गयंद कुंभ-थल नखन विदारे ।
मोती रक्त समेत डारि भूतल सिंगारे ॥

बाँकी दाढ़ विशाल वदन में रसना लोले ।
भीम भयानक रूप देख जन थरहर डोले ॥

ऐसे मृग-पति पग-तले, जो नर आयो होय ।
शरण गये तुम चरण की, बाधा करे न सोय ॥39॥

प्रलय-पवनकरि उठी आग जो तास पटंतर ।
वमे फुलिंग शिखा उतंग पर जले निरंतर ॥

जगत् समस्त निगल्ल भस्म कर देगी मानो ।
तड़-तड़ाट दव-अनल जोर चहुँ-दिशा उठानो ॥

सो इक छिन में उपशमे, नाम-नीर तुम लेत ।
होय सरोवर परिनमे, विकसित-कमल समेत ॥40॥

कोकिल-कंठ-समान श्याम-तन क्रोध जलंता ।
रक्त-नयन फुंकार मार विष-कण उगलंता ॥

फण को ऊँचा करे वेगि ही सन्मुख धाया ।
तव जन होय नि:शंक देख फणपति को आया ॥

जो चाँपे निज पग-तले, व्यापे विष न लगार ।
नाग-दमनि तुम नाम की, है जिनके आधार ॥41॥

जिस रन माहिं भयानक रव कर रहे तुरंगम ।
घन-सम गज गरजाहिं मत्त मानों गिरि-जंगम ॥

अति-कोलाहल-माँहिं बात जहँ नाहिं सुनीजे ।
राजन को परचंड देख बल धीरज छीजे ॥

नाथ तिहारे नाम तें, अघ छिन माँहि पलाय ।
ज्यों दिनकर परकाश तें, अंधकार विनशाय ॥42॥

मारें जहाँ गयंद-कुंभ हथियार विदारे ।
उमगे रुधिर-प्रवाह वेग जल-सम विस्तारे ॥

होय तिरन असमर्थ महाजोधा बलपूरे ।
तिस रन में जिन तोर भक्त जे हैं नर सूरे ॥

दुर्जय अरिकुल जीतके, जय पावें निकलंक ।
तुम पद-पंकज मन बसें, ते नर सदा निशंक ॥43॥

नक्र चक्र मगरादि मच्छ-करि भय उपजावे ।
जा में बड़वा अग्नि दाह तें नीर जलावे ॥

पार न पावे जास थाह नहिं लहिये जाकी ।
गरजे अतिगंभीर लहर की गिनति न ताकी ॥

सुख सों तिरें समुद्र को, जे तुम गुन सुमिराहिं ।
लोल-कलोलन के शिखर, पार यान ले जाहिं ॥44॥

महा जलोदर रोग-भार पीड़ित नर जे हैं ।
वात पित्त कफ कुष्ट आदि जो रोग गहे हैं ॥

सोचत रहें उदास नाहिं जीवन की आशा ।
अति घिनावनी देह धरें दुर्गंधि-निवासा ॥

तुम पद-पंकज-धूल को, जो लावें निज-अंग ।
ते नीरोग शरीर लहि, छिन में होंय अनंग ॥45॥

पाँव कंठ तें जकड़ बाँध साँकल अतिभारी ।
गाढ़ी बेड़ी पैर-माहिं जिन जाँघ विदारी ॥

भूख-प्यास चिंता शरीर-दु:ख जे विललाने ।
सरन नाहिं जिन कोय भूप के बंदीखाने ॥

तुम सुमिरत स्वयमेव ही, बंधन सब खुल जाहिं ।
छिन में ते संपति लहें, चिंता भय विनसाहिं ॥46॥

महामत्त गजराज और मृगराज दवानल ।
फणपति रण-परचंड नीर-निधि रोग महाबल ॥

बंधन ये भय आठ डरपकर मानों नाशे ।
तुम सुमिरत छिनमाहिं अभय थानक परकाशे ॥

इस अपार-संसार में, शरन नाहिं प्रभु कोय ।
यातैं तुम पदभक्त को भक्ति सहाई होय ॥47॥

यह गुनमाल विशाल नाथ! तुम गुनन सँवारी ।
विविध-वर्णमय-पुहुप गूँथ मैं भक्ति विथारी ॥

जे नर पहिरें कंठ भावना मन में भावें ।
‘मानतुंग’-सम निजाधीन शिवलक्ष्मी पावें ॥

भाषा-भक्तामर कियो, ‘हेमराज’ हित-हेत ।
जे नर पढ़ें सुभाव-सों, ते पावें शिव-खेत ॥48॥

Video

Bhaktamar Stotra in Hindi | भक्तामर स्तोत्र हिंदी में विडियो निचे दिया गया है. इस विडियो को आप अवस्य ही देखें.

भक्तामर स्तोत्र हिंदी में

Bhaktamar Stotra in Sanskrit with Meaning in Hindi

भक्तामर स्तोत्र हिंदी अर्थ के साथ

Shri Bhaktamar Stotra – 1

Stotra 1

भक्तामर प्रणत मौलिमणि प्रभाणा ।
मुद्योतकं दलित पाप तमोवितानम् ॥
सम्यक् प्रणम्य जिन पादयुगं युगादा ।
वालंबनं भवजले पततां जनानाम् ॥१॥

हिंदी अर्थ –

झुके हुए भक्त देवो के मुकुट जड़ित मणियों की प्रथा को प्रकाशित करने वाले, पाप रुपी अंधकार के समुह को नष्ट करने वाले, कर्मयुग के प्रारम्भ में संसार समुन्द्र में डूबते हुए प्राणियों के लिये आलम्बन भूत जिनेन्द्रदेव के चरण युगल को मन वचन कार्य से प्रणाम करके (मैं मुनि मानतुंग उनकी स्तुति करुँगा)|

Shri Bhaktamar Stotra – 2

stotra 2

यः संस्तुतः सकल वाङ्मय तत्वबोधा ।
द् उद्भूत बुद्धिपटुभिः सुरलोकनाथैः ॥
स्तोत्रैर्जगत्त्रितय चित्त हरैरुदरैः ।
स्तोष्ये किलाहमपि तं प्रथमं जिनेन्द्रम् ॥२॥

हिंदी अर्थ –

सम्पूर्णश्रुतज्ञान से उत्पन्न हुई बुद्धि की कुशलता से इन्द्रों के द्वारा तीन लोक के मन को हरने वाले, गंभीर स्तोत्रों के द्वारा जिनकी स्तुति की गई है उन आदिनाथ जिनेन्द्र की निश्चय ही मैं (मानतुंग) भी स्तुति करुँगा|

Shri Bhaktamar Stotra – 3

stotra 3

बुद्ध्या विनाऽपि विबुधार्चित पादपीठ ।
स्तोतुं समुद्यत मतिर्विगतत्रपोऽहम् ॥
बालं विहाय जलसंस्थितमिन्दु बिम्ब ।
मन्यः क इच्छति जनः सहसा ग्रहीतुम् ॥३॥

हिंदी अर्थ –

देवों के द्वारा पूजित हैं सिंहासन जिनका, ऐसे हे जिनेन्द्र मैं बुद्धि रहित होते हुए भी निर्लज्ज होकर स्तुति करने के लिये तत्पर हुआ हूँ क्योंकि जल में स्थित चन्द्रमा के प्रतिबिम्ब को बालक को छोड़कर दूसरा कौन मनुष्य सहसा पकड़ने की इच्छा करेगा? अर्थात् कोई नहीं|

Shri Bhaktamar Stotra – 4

stotra 4

वक्तुं गुणान् गुणसमुद्र शशाङ्क्कान्तान् ।
कस्ते क्षमः सुरगुरुप्रतिमोऽपि बुद्ध्या ॥
कल्पान्त काल् पवनोद्धत नक्रचक्रं ।
को वा तरीतुमलमम्बुनिधिं भुजाभ्याम् ॥४॥

हिंदी अर्थ –

हे गुणों के भंडार! आपके चन्द्रमा के समान सुन्दर गुणों को कहने लिये ब्रहस्पति के सद्रश भी कौन पुरुष समर्थ है? अर्थात् कोई नहीं| अथवा प्रलयकाल की वायु के द्वारा प्रचण्ड है मगरमच्छों का समूह जिसमें ऐसे समुद्र को भुजाओं के द्वारा तैरने के लिए कौन समर्थ है अर्थात् कोई नहीं|

Shri Bhaktamar Stotra – 5

Stotra 5

सोऽहं तथापि तव भक्ति वशान्मुनीश ।
कर्तुं स्तवं विगतशक्तिरपि प्रवृत्तः ॥
प्रीत्यऽऽत्मवीर्यमविचार्य मृगो मृगेन्द्रं ।
नाभ्येति किं निजशिशोः परिपालनार्थम् ॥५॥

हिंदी अर्थ –

हे मुनीश! तथापि-शक्ति रहित होता हुआ भी, मैं- अल्पज्ञ, भक्तिवश, आपकी स्तुति करने को तैयार हुआ हूँ| हरिणि, अपनी शक्ति का विचार न कर, प्रीतिवश अपने शिशु की रक्षा के लिये, क्या सिंह के सामने नहीं जाती? अर्थात जाती हैं|

Shri Bhaktamar Stotra – 6

stotra 6

अल्पश्रुतं श्रुतवतां परिहासधाम् ।
त्वद्भक्तिरेव मुखरीकुरुते बलान्माम् ॥
यत्कोकिलः किल मधौ मधुरं विरौति ।
तच्चारुचूत कलिकानिकरैकहेतु ॥६॥

हिंदी अर्थ –

विद्वानों की हँसी के पात्र, मुझ अल्पज्ञानी को आपकी भक्ति ही बोलने को विवश करती हैं| बसन्त ऋतु में कोयल जो मधुर शब्द करती है उसमें निश्चय से आम्र कलिका ही एक मात्र कारण हैं|

Shri Bhaktamar Stotra – 7

stotra 7

त्वत्संस्तवेन भवसंतति सन्निबद्धं ।
पापं क्षणात् क्षयमुपैति शरीर भाजाम् ॥
आक्रान्त लोकमलिनीलमशेषमाशु ।
सूर्यांशुभिन्नमिव शार्वरमन्धकारम् ॥७॥

हिंदी अर्थ –

आपकी स्तुति से, प्राणियों के, अनेक जन्मों में बाँधे गये पाप कर्म क्षण भर में नष्ट हो जाते हैं जैसे सम्पूर्ण लोक में व्याप्त रात्री का अंधकार सूर्य की किरणों से क्षणभर में छिन्न भिन्न हो जाता है|

Shri Bhaktamar Stotra – 8

stotra 8

मत्वेति नाथ्! तव् संस्तवनं मयेद ।
मारभ्यते तनुधियापि तव प्रभावात् ॥
चेतो हरिष्यति सतां नलिनीदलेषु ।
मुक्ताफल द्युतिमुपैति ननूदबिन्दुः ॥८॥

हिंदी अर्थ –

हे स्वामिन्! ऐसा मानकर मुझ मन्दबुद्धि के द्वारा भी आपका यह स्तवन प्रारम्भ किया जाता है, जो आपके प्रभाव से सज्जनों के चित्त को हरेगा| निश्चय से पानी की बूँद कमलिनी के पत्तों पर मोती के समान शोभा को प्राप्त करती हैं|

Shri Bhaktamar Stotra – 9

stotra 9

आस्तां तव स्तवनमस्तसमस्त दोषं ।
त्वत्संकथाऽपि जगतां दुरितानि हन्ति ॥
दूरे सहस्त्रकिरणः कुरुते प्रभैव ।
पद्माकरेषु जलजानि विकाशभांजि ॥९॥

हिंदी अर्थ –

सम्पूर्ण दोषों से रहित आपका स्तवन तो दूर, आपकी पवित्र कथा भी प्राणियों के पापों का नाश कर देती है| जैसे, सूर्य तो दूर, उसकी प्रभा ही सरोवर में कमलों को विकसित कर देती है|

Shri Bhaktamar Stotra – 10

stotra 10

नात्यद् भूतं भुवन भुषण भूतनाथ ।
भूतैर् गुणैर् भुवि भवन्तमभिष्टुवन्तः ॥
तुल्या भवन्ति भवतो ननु तेन किं वा ।
भूत्याश्रितं य इह नात्मसमं करोति ॥१०॥

हिंदी अर्थ –

हे जगत् के भूषण! हे प्राणियों के नाथ! सत्यगुणों के द्वारा आपकी स्तुति करने वाले पुरुष पृथ्वी पर यदि आपके समान हो जाते हैं तो इसमें अधिक आश्चर्य नहीं है| क्योंकि उस स्वामी से क्या प्रयोजन, जो इस लोक में अपने अधीन पुरुष को सम्पत्ति के द्वारा अपने समान नहीं कर लेता |

Shri Bhaktamar Stotra – 11

stotra 11

दृष्टवा भवन्तमनिमेष विलोकनीयं ।
नान्यत्र तोषमुपयाति जनस्य चक्षुः ॥
पीत्वा पयः शशिकरद्युति दुग्ध सिन्धोः ।
क्षारं जलं जलनिधेरसितुं क इच्छेत् ॥११॥

हिंदी अर्थ –

हे अभिमेष दर्शनीय प्रभो! आपके दर्शन के पश्चात् मनुष्यों के नेत्र अन्यत्र सन्तोष को प्राप्त नहीं होते| चन्द्रकीर्ति के समान निर्मल क्षीरसमुद्र के जल को पीकर कौन पुरुष समुद्र के खारे पानी को पीना चाहेगा? अर्थात् कोई नहीं |

Shri Bhaktamar Stotra – 12

stotra 12

यैः शान्तरागरुचिभिः परमाणुभिस्तवं ।
निर्मापितस्त्रिभुवनैक ललाम भूत ॥
तावन्त एव खलु तेऽप्यणवः पृथिव्यां ।
यत्ते समानमपरं न हि रूपमस्ति ॥१२॥

हिंदी अर्थ –

हे त्रिभुवन के एकमात्र आभुषण जिनेन्द्रदेव! जिन रागरहित सुन्दर परमाणुओं के द्वारा आपकी रचना हुई वे परमाणु पृथ्वी पर निश्चय से उतने ही थे क्योंकि आपके समान दूसरा रूप नहीं है |

Shri Bhaktamar Stotra – 13

stotra 13

वक्त्रं क्व ते सुरनरोरगनेत्रहारि ।
निःशेष निर्जित जगत् त्रितयोपमानम् ॥
बिम्बं कलङ्क मलिनं क्व निशाकरस्य ।
यद्वासरे भवति पांडुपलाशकल्पम् ॥१३॥

हिंदी अर्थ –

हे प्रभो! सम्पूर्ण रुप से तीनों जगत् की उपमाओं का विजेता, देव मनुष्य तथा धरणेन्द्र के नेत्रों को हरने वाला कहां आपका मुख? और कलंक से मलिन, चन्द्रमा का वह मण्डल कहां? जो दिन में पलाश (ढाक) के पत्ते के समान फीका पड़ जाता |

Shri Bhaktamar Stotra – 14

stotra 14

सम्पूर्णमण्ङल शशाङ्ककलाकलाप् ।
शुभ्रा गुणास्त्रिभुवनं तव लंघयन्ति ॥
ये संश्रितास् त्रिजगदीश्वर नाथमेकं ।
कस्तान् निवारयति संचरतो यथेष्टम् ॥१४॥

हिंदी अर्थ –

पूर्ण चन्द्र की कलाओं के समान उज्ज्वल आपके गुण, तीनों लोको में व्याप्त हैं क्योंकि जो अद्वितीय त्रिजगत् के भी नाथ के आश्रित हैं उन्हें इच्छानुसार घुमते हुए कौन रोक सकता हैं? कोई नहीं |

Shri Bhaktamar Stotra – 15

stotra 15

चित्रं किमत्र यदि ते त्रिदशांगनाभिर् ।
नीतं मनागपि मनो न विकार मार्गम् ॥
कल्पान्तकालमरुता चलिताचलेन ।
किं मन्दराद्रिशिखिरं चलितं कदाचित् ॥१५॥

हिंदी अर्थ –

यदि आपका मन देवागंनाओं के द्वारा किंचित् भी विक्रति को प्राप्त नहीं कराया जा सका, तो इस विषय में आश्चर्य ही क्या है? पर्वतों को हिला देने वाली प्रलयकाल की पवन के द्वारा क्या कभी मेरु का शिखर हिल सका है? नहीं |

Shri Bhaktamar Stotra – 16

stotra 16

निर्धूमवर्तिपवर्जित तैलपूरः ।
कृत्स्नं जगत्त्रयमिदं प्रकटी करोषि ॥
गम्यो न जातु मरुतां चलिताचलानां ।
दीपोऽपरस्त्वमसि नाथ् जगत्प्रकाशः ॥१६॥

हिंदी अर्थ –

हे स्वामिन्! आप धूम तथा बाती से रहित, तेल के प्रवाह के बिना भी इस सम्पूर्ण लोक को प्रकट करने वाले अपूर्व जगत् प्रकाशक दीपक हैं जिसे पर्वतों को हिला देने वाली वायु भी कभी बुझा नहीं सकती |

Shri Bhaktamar Stotra – 17

stotra 17

नास्तं कादाचिदुपयासि न राहुगम्यः ।
स्पष्टीकरोषि सहसा युगपज्जगन्ति ॥
नाम्भोधरोदर निरुद्धमहाप्रभावः ।
सूर्यातिशायिमहिमासि मुनीन्द्र! लोके ॥१७॥

हिंदी अर्थ –

हे मुनीन्द्र! आप न तो कभी अस्त होते हैं न ही राहु के द्वारा ग्रसे जाते हैं और न आपका महान तेज मेघ से तिरोहित होता है आप एक साथ तीनों लोकों को शीघ्र ही प्रकाशित कर देते हैं अतः आप सूर्य से भी अधिक महिमावन्त हैं |

Shri Bhaktamar Stotra – 18

stotra 18

नित्योदयं दलितमोहमहान्धकारं ।
गम्यं न राहुवदनस्य न वारिदानाम् ॥
विभ्राजते तव मुखाब्जमनल्प कान्ति ।
विद्योतयज्जगदपूर्व शशाङ्कबिम्बम् ॥१८॥

हिंदी अर्थ –

हमेशा उदित रहने वाला, मोहरुपी अंधकार को नष्ट करने वाला जिसे न तो राहु ग्रस सकता है, न ही मेघ आच्छादित कर सकते हैं, अत्यधिक कान्तिमान, जगत को प्रकाशित करने वाला आपका मुखकमल रुप अपूर्व चन्द्रमण्डल शोभित होता है |

Shri Bhaktamar Stotra – 19

stotra 19

किं शर्वरीषु शशिनाऽह्नि विवस्वता वा ।
युष्मन्मुखेन्दु दलितेषु तमस्सु नाथ ॥
निष्मन्न शालिवनशालिनि जीव लोके ।
कार्यं कियज्जलधरैर् जलभार नम्रैः ॥१९॥

हिंदी अर्थ –

हे स्वामिन्! जब अंधकार आपके मुख रुपी चन्द्रमा के द्वारा नष्ट हो जाता है तो रात्रि में चन्द्रमा से एवं दिन में सूर्य से क्या प्रयोजन? पके हुए धान्य के खेतों से शोभायमान धरती तल पर पानी के भार से झुके हुए मेघों से फिर क्या प्रयोजन |

Shri Bhaktamar Stotra – 20

stotra 20

ज्ञानं यथा त्वयि विभाति कृतावकाशं ।
नैवं तथा हरिहरादिषु नायकेषु ॥
तेजः स्फुरन्मणिषु याति यथा महत्वं ।
नैवं तु काच शकले किरणाकुलेऽपि ॥२०॥

हिंदी अर्थ –

अवकाश को प्राप्त ज्ञान जिस प्रकार आप में शोभित होता है वैसा विष्णु महेश आदि देवों में नहीं | कान्तिमान मणियों में, तेज जैसे महत्व को प्राप्त होता है वैसे किरणों से व्याप्त भी काँच के टुकड़े में नहीं होता |

Shri Bhaktamar Stotra – 21

stotra 21

मन्ये वरं हरि हरादय एव दृष्टा ।
दृष्टेषु येषु हृदयं त्वयि तोषमेति ॥
किं वीक्षितेन भवता भुवि येन नान्यः ।
कश्चिन्मनो हरति नाथ! भवान्तरेऽपि ॥२१॥

हिंदी अर्थ –

हे स्वामिन्| देखे गये विष्णु महादेव ही मैं उत्तम मानता हूँ, जिन्हें देख लेने पर मन आपमें सन्तोष को प्राप्त करता है| किन्तु आपको देखने से क्या लाभ? जिससे कि प्रथ्वी पर कोई दूसरा देव जन्मान्तर में भी चित्त को नहीं हर पाता |

Shri Bhaktamar Stotra – 22

stotra 22

स्त्रीणां शतानि शतशो जनयन्ति पुत्रान् ।
नान्या सुतं त्वदुपमं जननी प्रसूता ॥
सर्वा दिशो दधति भानि सहस्त्ररश्मिं ।
प्राच्येव दिग् जनयति स्फुरदंशुजालं ॥२२॥

हिंदी अर्थ –

सैकड़ों स्त्रियाँ सैकड़ों पुत्रों को जन्म देती हैं, परन्तु आप जैसे पुत्र को दूसरी माँ उत्पन्न नहीं कर सकी| नक्षत्रों को सभी दिशायें धारण करती हैं परन्तु कान्तिमान् किरण समूह से युक्त सूर्य को पूर्व दिशा ही जन्म देती हैं |

Shri Bhaktamar Stotra – 23

stotra 24

त्वामामनन्ति मुनयः परमं पुमांस ।
मादित्यवर्णममलं तमसः परस्तात् ॥
त्वामेव सम्यगुपलभ्य जयंति मृत्युं ।
नान्यः शिवः शिवपदस्य मुनीन्द्र! पन्थाः ॥२३॥

हिंदी अर्थ –

हे मुनीन्द्र! तपस्वीजन आपको सूर्य की तरह तेजस्वी निर्मल और मोहान्धकार से परे रहने वाले परम पुरुष मानते हैं | वे आपको ही अच्छी तरह से प्राप्त कर म्रत्यु को जीतते हैं | इसके सिवाय मोक्षपद का दूसरा अच्छा रास्ता नहीं है |

Shri Bhaktamar Stotra – 24

stotra 24

त्वामव्ययं विभुमचिन्त्यमसंख्यमाद्यं ।
ब्रह्माणमीश्वरम् अनंतमनंगकेतुम् ॥
योगीश्वरं विदितयोगमनेकमेकं ।
ज्ञानस्वरूपममलं प्रवदन्ति सन्तः ॥२४॥

हिंदी अर्थ –

सज्जन पुरुष आपको शाश्वत, विभु, अचिन्त्य, असंख्य, आद्य, ब्रह्मा, ईश्वर, अनन्त, अनंगकेतु, योगीश्वर, विदितयोग, अनेक, एक ज्ञानस्वरुप और अमल कहते हैं |

Shri Bhaktamar Stotra – 25

stotra 25

बुद्धस्त्वमेव विबुधार्चित बुद्धि बोधात् ।
त्वं शंकरोऽसि भुवनत्रय शंकरत्वात् ॥
धाताऽसि धीर! शिवमार्ग विधेर्विधानात् ।
व्यक्तं त्वमेव भगवन्! पुरुषोत्तमोऽसि ॥२५॥

हिंदी अर्थ –

देव अथवा विद्वानों के द्वारा पूजित ज्ञान वाले होने से आप ही बुद्ध हैं| तीनों लोकों में शान्ति करने के कारण आप ही शंकर हैं| हे धीर! मोक्षमार्ग की विधि के करने वाले होने से आप ही ब्रह्मा हैं| और हे स्वामिन्! आप ही स्पष्ट रुप से मनुष्यों में उत्तम अथवा नारायण हैं |

Shri Bhaktamar Stotra – 26

stotra 26

तुभ्यं नमस्त्रिभुवनार्तिहराय नाथ ।
तुभ्यं नमः क्षितितलामलभूषणाय ॥
तुभ्यं नमस्त्रिजगतः परमेश्वराय ।
तुभ्यं नमो जिन! भवोदधि शोषणाय ॥२६॥

हिंदी अर्थ –

हे स्वामिन्! तीनों लोकों के दुःख को हरने वाले आपको नमस्कार हो, प्रथ्वीतल के निर्मल आभुषण स्वरुप आपको नमस्कार हो, तीनों जगत् के परमेश्वर आपको नमस्कार हो और संसार समुन्द्र को सुखा देने वाले आपको नमस्कार हो|

Shri Bhaktamar Stotra – 27

stotra 27

को विस्मयोऽत्र यदि नाम गुणैरशेषैस् ।
त्वं संश्रितो निरवकाशतया मुनीश! ॥
दोषैरूपात्त विविधाश्रय जातगर्वैः ।
स्वप्नान्तरेऽपि न कदाचिदपीक्षितोऽसि ॥२७॥

हिंदी अर्थ –

हे मुनीश! अन्यत्र स्थान न मिलने के कारण समस्त गुणों ने यदि आपका आश्रय लिया हो तो तथा अन्यत्र अनेक आधारों को प्राप्त होने से अहंकार को प्राप्त दोषों ने कभी स्वप्न में भी आपको न देखा हो तो इसमें क्या आश्चर्य?

Shri Bhaktamar Stotra – 28

stotra 28

उच्चैरशोक तरुसंश्रितमुन्मयूख ।
माभाति रूपममलं भवतो नितान्तम् ॥
स्पष्टोल्लसत्किरणमस्त तमोवितानं ।
बिम्बं रवेरिव पयोधर पार्श्ववर्ति ॥२८॥

हिंदी अर्थ –

ऊँचे अशोक वृक्ष के नीचे स्थित, उन्नत किरणों वाला, आपका उज्ज्वल रुप जो स्पष्ट रुप से शोभायमान किरणों से युक्त है, अंधकार समूह के नाशक, मेघों के निकट स्थित सूर्य बिम्ब की तरह अत्यन्त शोभित होता है |

Shri Bhaktamar Stotra – 29

stotra 29

सिंहासने मणिमयूखशिखाविचित्रे ।
विभ्राजते तव वपुः कनकावदातम् ॥
बिम्बं वियद्विलसदंशुलता वितानं ।
तुंगोदयाद्रि शिरसीव सहस्त्ररश्मेः ॥२९॥

हिंदी अर्थ –

मणियों की किरण-ज्योति से सुशोभित सिंहासन पर, आपका सुवर्ण कि तरह उज्ज्वल शरीर, उदयाचल के उच्च शिखर पर आकाश में शोभित, किरण रुप लताओं के समूह वाले सूर्य मण्डल की तरह शोभायमान हो रहा है|

Shri Bhaktamar Stotra – 30

stotra 30

कुन्दावदात चलचामर चारुशोभं ।
विभ्राजते तव वपुः कलधौतकान्तम् ॥
उद्यच्छशांक शुचिनिर्झर वारिधार ।
मुच्चैस्तटं सुर गिरेरिव शातकौम्भम् ॥३०॥

हिंदी अर्थ –

कुन्द के पुष्प के समान धवल चँवरों के द्वारा सुन्दर है शोभा जिसकी, ऐसा आपका स्वर्ण के समान सुन्दर शरीर, सुमेरुपर्वत, जिस पर चन्द्रमा के समान उज्ज्वल झरने के जल की धारा बह रही है, के स्वर्ण निर्मित ऊँचे तट की तरह शोभायमान हो रहा है|

Shri Bhaktamar Stotra – 31

Stotra 31

छत्रत्रयं तव विभाति शशांककान्त ।
मुच्चैः स्थितं स्थगित भानुकर प्रतापम् ॥
मुक्ताफल प्रकरजाल विवृद्धशोभं ।
प्रख्यापयत्त्रिजगतः परमेश्वरत्वम् ॥३१॥

हिंदी अर्थ –

चन्द्रमा के समान सुन्दर, सूर्य की किरणों के सन्ताप को रोकने वाले, तथा मोतियों के समूहों से बढ़ती हुई शोभा को धारण करने वाले, आपके ऊपर स्थित तीन छत्र, मानो आपके तीन लोक के स्वामित्व को प्रकट करते हुए शोभित हो रहे हैं|

Shri Bhaktamar Stotra – 32

stotra 32

गम्भीरतारवपूरित दिग्विभागस् ।
त्रैलोक्यलोक शुभसंगम भूतिदक्षः ॥
सद्धर्मराजजयघोषण घोषकः सन् ।
खे दुन्दुभिर्ध्वनति ते यशसः प्रवादी ॥३२॥

हिंदी अर्थ –

गम्भीर और उच्च शब्द से दिशाओं को गुञ्जायमान करने वाला, तीन लोक के जीवों को शुभ विभूति प्राप्त कराने में समर्थ और समीचीन जैन धर्म के स्वामी की जय घोषणा करने वाला दुन्दुभि वाद्य आपके यश का गान करता हुआ आकाश में शब्द करता है|

Shri Bhaktamar Stotra – 33

stotra 33

मन्दार सुन्दरनमेरू सुपारिजात ।
सन्तानकादिकुसुमोत्कर- वृष्टिरुद्धा ॥
गन्धोदबिन्दु शुभमन्द मरुत्प्रपाता ।
दिव्या दिवः पतित ते वचसां ततिर्वा ॥३३॥

हिंदी अर्थ –

सुगंधित जल बिन्दुओं और मन्द सुगन्धित वायु के साथ गिरने वाले श्रेष्ठ मनोहर मन्दार, सुन्दर, नमेरु, पारिजात, सन्तानक आदि कल्पवृक्षों के पुष्पों की वर्षा आपके वचनों की पंक्तियों की तरह आकाश से होती है|

Shri Bhaktamar Stotra – 34

stotra 34

शुम्भत्प्रभावलय भूरिविभा विभोस्ते ।
लोकत्रये द्युतिमतां द्युतिमाक्षिपन्ती ॥
प्रोद्यद् दिवाकर निरन्तर भूरिसंख्या ।
दीप्त्या जयत्यपि निशामपि सोम सौम्याम् ॥३४॥

हिंदी अर्थ –

हे प्रभो! तीनों लोकों के कान्तिमान पदार्थों की प्रभा को तिरस्कृत करती हुई आपके मनोहर भामण्डल की विशाल कान्ति एक साथ उगते हुए अनेक सूर्यों की कान्ति से युक्त होकर भी चन्द्रमा से शोभित रात्रि को भी जीत रही है|

Shri Bhaktamar Stotra – 35

stotra 35

स्वर्गापवर्गगममार्ग विमार्गणेष्टः ।
सद्धर्मतत्वकथनैक पटुस्त्रिलोक्याः ॥
दिव्यध्वनिर्भवति ते विशदार्थसत्व ।
भाषास्वभाव परिणामगुणैः प्रयोज्यः ॥३५॥

हिंदी अर्थ –

आपकी दिव्यध्वनि स्वर्ग और मोक्षमार्ग की खोज में साधक, तीन लोक के जीवों को समीचीन धर्म का कथन करने में समर्थ, स्पष्ट अर्थ वाली, समस्त भाषाओं में परिवर्तित करने वाले स्वाभाविक गुण से सहित होती है|

Shri Bhaktamar Stotra – 36

stotra 36

उन्निद्रहेम नवपंकज पुंजकान्ती ।
पर्युल्लसन्नखमयूख शिखाभिरामौ ॥
पादौ पदानि तव यत्र जिनेन्द्र! धत्तः ।
पद्मानि तत्र विबुधाः परिकल्पयन्ति ॥३६॥

हिंदी अर्थ –

पुष्पित नव स्वर्ण कमलों के समान शोभायमान नखों की किरण प्रभा से सुन्दर आपके चरण जहाँ पड़ते हैं वहाँ देव गण स्वर्ण कमल रच देते हैं|

Shri Bhaktamar Stotra – 37

stotra 37

इत्थं यथा तव विभूतिरभूज्जिनेन्द्र ।
धर्मोपदेशनविधौ न तथा परस्य ॥
यादृक् प्रभा दिनकृतः प्रहतान्धकारा ।
तादृक् कुतो ग्रहगणस्य विकाशिनोऽपि ॥३७॥

हिंदी अर्थ –

हे जिनेन्द्र! इस प्रकार धर्मोपदेश के कार्य में जैसा आपका ऐश्वर्य था वैसा अन्य किसी का नही हुआ| अंधकार को नष्ट करने वाली जैसी प्रभा सूर्य की होती है वैसी अन्य प्रकाशमान भी ग्रहों की कैसे हो सकती है?

Shri Bhaktamar Stotra – 38

Stotra 38

श्च्योतन्मदाविलविलोल कपोलमूल ।
मत्तभ्रमद् भ्रमरनाद विवृद्धकोपम् ॥
ऐरावताभमिभमुद्धतमापतन्तं ।
दृष्ट्वा भयं भवति नो भवदाश्रितानाम् ॥३८॥

हिंदी अर्थ –

आपके आश्रित मनुष्यों को, झरते हुए मद जल से जिसके गण्डस्थल मलीन, कलुषित तथा चंचल हो रहे है और उन पर उन्मत्त होकर मंडराते हुए काले रंग के भौरे अपने गुजंन से क्रोध बढा़ रहे हों ऐसे ऐरावत की तरह उद्दण्ड, सामने आते हुए हाथी को देखकर भी भय नहीं होता|

Shri Bhaktamar Stotra – 39

stotra 39

भिन्नेभ कुम्भ गलदुज्जवल शोणिताक्त ।
मुक्ताफल प्रकर भूषित भुमिभागः ॥
बद्धक्रमः क्रमगतं हरिणाधिपोऽपि ।
नाक्रामति क्रमयुगाचलसंश्रितं ते ॥३९॥

हिंदी अर्थ –

सिंह, जिसने हाथी का गण्डस्थल विदीर्ण कर, गिरते हुए उज्ज्वल तथा रक्तमिश्रित गजमुक्ताओं से पृथ्वी तल को विभूषित कर दिया है तथा जो छलांग मारने के लिये तैयार है वह भी अपने पैरों के पास आये हुए ऐसे पुरुष पर आक्रमण नहीं करता जिसने आपके चरण युगल रुप पर्वत का आश्रय ले रखा है|

Shri Bhaktamar Stotra – 40

stotra 40

कल्पांतकाल पवनोद्धत वह्निकल्पं ।
दावानलं ज्वलितमुज्जवलमुत्स्फुलिंगम् ॥
विश्वं जिघत्सुमिव सम्मुखमापतन्तं ।
त्वन्नामकीर्तनजलं शमयत्यशेषम् ॥४०॥

हिंदी अर्थ –

आपके नाम यशोगानरुपी जल, प्रलयकाल की वायु से उद्धत, प्रचण्ड अग्नि के समान प्रज्वलित, उज्ज्वल चिनगारियों से युक्त, संसार को भक्षण करने की इच्छा रखने वाले की तरह सामने आती हुई वन की अग्नि को पूर्ण रुप से बुझा देता है|

Shri Bhaktamar Stotra – 41

stotra 41

रक्तेक्षणं समदकोकिल कण्ठनीलं ।
क्रोधोद्धतं फणिनमुत्फणमापतन्तम् ॥
आक्रामति क्रमयुगेन निरस्तशंकस् ।
त्वन्नाम नागदमनी हृदि यस्य पुंसः ॥४१॥

जिस पुरुष के ह्रदय में नामरुपी-नागदौन नामक औषध मौजूद है, वह पुरुष लाल लाल आँखो वाले, मदयुक्त कोयल के कण्ठ की तरह काले, क्रोध से उद्धत और ऊपर को फण उठाये हुए, सामने आते हुए सर्प को निश्शंक होकर दोनों पैरो से लाँघ जाता है|

Shri Bhaktamar Stotra – 42

stotra 42

वल्गत्तुरंग गजगर्जित भीमनाद ।
माजौ बलं बलवतामपि भूपतिनाम्! ॥
उद्यद्दिवाकर मयूख शिखापविद्धं ।
त्वत्- कीर्तनात् तम इवाशु भिदामुपैति ॥४२॥

हिंदी अर्थ –

आपके यशोगान से युद्धक्षेत्र में उछलते हुए घोडे़ और हाथियों की गर्जना से उत्पन भयंकर कोलाहल से युक्त पराक्रमी राजाओं की भी सेना, उगते हुए सूर्य किरणों की शिखा से वेधे गये अंधकार की तरह शीघ्र ही नाश को प्राप्त हो जाती है|

Shri Bhaktamar Stotra – 43

stotra 43

कुन्ताग्रभिन्नगज शोणितवारिवाह ।
वेगावतार तरणातुरयोध भीमे ॥
युद्धे जयं विजितदुर्जयजेयपक्षास् ।
त्वत्पाद पंकजवनाश्रयिणो लभन्ते ॥४३॥

हिंदी अर्थ –

हे भगवन् आपके चरण कमलरुप वन का सहारा लेने वाले पुरुष, भालों की नोकों से छेद गये हाथियों के रक्त रुप जल प्रवाह में पडे़ हुए, तथा उसे तैरने के लिये आतुर हुए योद्धाओं से भयानक युद्ध में, दुर्जय शत्रु पक्ष को भी जीत लेते हैं|

Shri Bhaktamar Stotra – 44

stotra 44

अम्भौनिधौ क्षुभितभीषणनक्रचक्र ।
पाठीन पीठभयदोल्बणवाडवाग्नौ ॥
रंगत्तरंग शिखरस्थित यानपात्रास् ।
त्रासं विहाय भवतःस्मरणाद् व्रजन्ति ॥४४॥

हिंदी अर्थ –

क्षोभ को प्राप्त भयंकर मगरमच्छों के समूह और मछलियों के द्वारा भयभीत करने वाले दावानल से युक्त समुद्र में विकराल लहरों के शिखर पर स्थित है जहाज जिनका, ऐसे मनुष्य, आपके स्मरण मात्र से भय छोड़कर पार हो जाते हैं|

Shri Bhaktamar Stotra – 45

stotra 45

उद्भूतभीषणजलोदर भारभुग्नाः ।
शोच्यां दशामुपगताश्च्युतजीविताशाः ॥
त्वत्पादपंकज रजोऽमृतदिग्धदेहा ।
मर्त्या भवन्ति मकरध्वजतुल्यरूपाः ॥४५॥

हिंदी अर्थ –

उत्पन्न हुए भीषण जलोदर रोग के भार से झुके हुए, शोभनीय अवस्था को प्राप्त और नहीं रही है जीवन की आशा जिनके, ऐसे मनुष्य आपके चरण कमलों की रज रुप अम्रत से लिप्त शरीर होते हुए कामदेव के समान रुप वाले हो जाते हैं|

Shri Bhaktamar Stotra – 46

stotra 46

आपाद कण्ठमुरूश्रृंखल वेष्टितांगा ।
गाढं बृहन्निगडकोटिनिघृष्टजंघाः ॥
त्वन्नाममंत्रमनिशं मनुजाः स्मरन्तः ।
सद्यः स्वयं विगत बन्धभया भवन्ति ॥४६॥

हिंदी अर्थ –

जिनका शरीर पैर से लेकर कण्ठ पर्यन्त बडी़-बडी़ सांकलों से जकडा़ हुआ है और विकट सघन बेड़ियों से जिनकी जंघायें अत्यन्त छिल गईं हैं ऐसे मनुष्य निरन्तर आपके नाममंत्र को स्मरण करते हुए शीघ्र ही बन्धन मुक्त हो जाते है|

Shri Bhaktamar Stotra – 47

stotra 47

मत्तद्विपेन्द्र मृगराज दवानलाहि ।
संग्राम वारिधि महोदर बन्धनोत्थम् ॥
तस्याशु नाशमुपयाति भयं भियेव ।
यस्तावकं स्तवमिमं मतिमानधीते ॥४७॥

हिंदी अर्थ –

जो बुद्धिमान मनुष्य आपके इस स्तवन को पढ़ता है उसका मत्त हाथी, सिंह, दवानल, युद्ध, समुद्र जलोदर रोग और बन्धन आदि से उत्पन्न भय मानो डरकर शीघ्र ही नाश को प्राप्त हो जाता है|

Shri Bhaktamar Stotra – 48

stotra 48

स्तोत्रस्त्रजं तव जिनेन्द्र! गुणैर्निबद्धां ।
भक्त्या मया विविधवर्णविचित्रपुष्पाम् ॥
धत्ते जनो य इह कंठगतामजस्रं ।
तं मानतुंगमवशा समुपैति लक्ष्मीः ॥४८॥

हिंदी अर्थ –

हे जिनेन्द्र देव! इस जगत् में जो लोग मेरे द्वारा भक्तिपूर्वक (ओज, प्रसाद, माधुर्य आदि) गुणों से रची गई नाना अक्षर रुप, रंग बिरंगे फूलों से युक्त आपकी स्तुति रुप माला को कंठाग्र करता है उस उन्नत सम्मान वाले पुरुष को अथवा आचार्य मानतुंग को स्वर्ग मोक्षादि की विभूति अवश्य प्राप्त होती है|

Bhaktamar Stotra with Hindi Meaning Video

भक्तामर स्तोत्र को हिंदी अर्थ के साथ ( Bhaktamar Stotra with Hindi Meaning ) विडियो निचे दिया गया है. आप इस विडियो को देखकर श्री भक्तामर स्तोत्र का हिंदी अर्थ समझ सकतें हैं.

Bhaktamar Stotra with Hindi meaning

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